मंगलवार, 22 जून 2010

दादा की छत्रछाया में

उम्मे अयमन आप को लेकर मक्का आईं तथा आप को आप के दादा को सौंप दिया इस घटना से आप के दादा को काफ़ी पीड़ा तथा रंज हुआ इसी कारण आप के दादा आप पर अती मेहरबान रहा करते इतना किसी पर मेहरबान नहीं रहते,  आप से खूब प्रेम करते तथा अपने बेटों पर तरजीह देते , आप का खूब ख्याल रखते , अपने खास बिस्तर पर बिठाते जिस पर किसी दूसरे को बैठने की हिम्मत नहीं होती , आप के पीठ को छूते तथा आप के खेल कूद तथा कार्यों से परसन्न्  होते , वो मानते थे कि  उनका पोता  भविष्य में महानतम व्यक्ति होगा , तथा इसकी   बड़ी शान होगी दो वर्ष के बाद जब आप कि आयु आठ वर्ष दो महीने तथा दस दिन की हो गयी तो उनका निधन हो गया , मरने से पहले उन्होंने आप को आपके चाचा अबू तालिब को सौंप दिया

माता की छत्रछाया में

हलीमा के यहाँ से आने के उपरांत लगभग दो वर्ष आपने अपनी माता की छत्रछाया में अपने परिवार में बिताया फिर आप की माता आप को लेकर उम्मे अयमन के संग अपने मैके मदीना गईं जहाँ उनके पति अब्दुल्लाह की क़ब्र भी थी, मदीना में एक मास ठहरने के बाद मक्का के लिए लौट गयीं वापसी में मक्का एवम् मदीना के बीच में अबवा नामी स्थान पर बीमार हुईं तथा वहीं उनका देहांत हो गया , और वहीं दफ़ना दी गयीं . आप उम्मे अयमन के साथ मक्का वापस आ गये. अब आप माँ  और बाप दोनों की तरफ से अनाथ हो चुके थे                

सीने की सर्जरी

हलीमा सादिया के घर में आप लग भग चार वर्षों तक रहे इस बीच एक ऐसी घटना घटी जिस ने हलीमा तथा उनके परिवार को डरा दिया , और वो घटना है आप के सीने को चीर कर शैतान के हिस्से का निकाला जाना , अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहो अन्हो ने इस घटने का वर्णन संछेप में कुछ इस तरह किया है : आप कुछ लड़कों के साथ खेल रहे थे कि जिबराईल अलैहिस्सलाम आप के पास आए तथा आप को ज़मीन पर डाल कर आप के पेट को चीर दिया , उस में से आप का दिल निकाला , फिर उस में से एक टुकड़ा निकाला ,और आप से कहा कि : यह आप के अंदर शैतान का हिस्सा था. फिर आप के दिल को सोने की थाली में ज़मज़म के पानी से धोया, फिर उसे साफ करके उसी स्थान पर लौटा दिया
लड़के दौड़ते हुए आप की रेज़ाई माँ ( हलीमा ) के पास आए और कहने लगे : मुहम्मद की हत्या कर दी गयी , लोग जब आप के पास पहुँचे तो आप का रंग बदला हुआ था . अनस कहते हैं कि : मैंआप की छाती में चीर का निशान देखता था इस घटना ने हलीमा को इतना भयभीत कर दिया कि वो तुरंत आप को लेकर आप की माता के पास चली गयीं तथा उनको उनका लाडला सौंप दिया

हलीमा सादिया के घर में

उस समय अरब में रवाज था कि आस पास के देहात की रहने वाली औरतें शहरों में जाकर दूध पीते बच्चों को लाया करतीं तथा स्तनपान (दूध पिलाने) के बदले में उनको अच्छा ख़ासा मुआवज़ा मिल जाता, शहर वाले भी अपने बच्चों को गांव देहातों में भेज दिया करते ताकि उनको शहरी बीमारयो से बचाएँ ताकि उनका शरीर मज़बूत हो जाए एवम् बचपन में ही उनको शुद्ध अरबी भाषा का ज्ञान हो जाए
अतः क़बीला हवाज़ीन के बनूसाद की हलीमा सादिया नामी औरत अपने पति अबू कब्शा हारिस पुत्र अब्दुल उज़्ज़ा एवम् क़बीले की दूसरी औरतों के संग बच्चे की तलाश में मक्का आई , आप को गोद लेने की कहानी का वर्णन खुद हलीमा करती है , कहती है : मै अपनी एक गध्धी पर सवार होकर जिसका रंग लाली मिली हुई उजला था दूसरी औरतों तथा अपने पति हारिस पुत्र अब्दुल उज़्ज़ा के साथ निकली मेरी सवारी के टाँग ( कमज़ोरी तथा दुबला होने के कारण ) आपस में टकरा कर ज़ख़्मी हो गये थे . मेरे संग एक बूढ़ी उंटनी भी थी जो अल्लाह की सौगंध एक क़तरा भी दूध नहीं देती थी और वो सुखाड़ का साल था लोग भूक प्यास से परिशान थे और मेरे साथ मेरा एक बेटा था ,अल्लाह की सौगंध ! वो रात भर नहीं सोता था, और मेरे पास कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जिस से मै उसे बहलाती , हम तो केवल बारिश की प्रतीक्षा कर रहे थे हमारे पास कुछ बकरियाँ थी जिन से दूध की आस लगाए हुए थे , जब हम मक्का पहुँचे तो हम में से सब ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलएहे वसल्लम को देखा लेकिन उन्हें लेना पसंद नहीं किया , हम सब कहते थे : ये तो अनाथ है , दूध पिलाने वाली औरत का ख्याल तो उसका पिता करता है उसकी माता या उसके चाचा या उसके दादा हमें क्या देंगे ? मेरी समस्त सहेलियों को दूध पीने वाले बच्चे मिल गये . मुझे रसुलुल्लाह ( सल्लल्लाहो अलएहे वसल्लम) के सवाए कोई अन्य नहीं मिला मै उनके पास वापस गयी और उन्हें ले लिया , अल्लाह की क़सम मैने उनको इस लिए लिया कि मुझ को उनके अलावा कोई दूसरा बच्चा न मिला , मैने अपने पति से कहा : अल्लाह कि क़सम मै बनू अब्दुल मुत्तलिब के इस अनाथ बालक को अवश्य लूँगी आशा है कि ईश्वर् हम सब को इस से लाभ पहुँचाएगा मै अपनी सहेलियों के साथ बिना बच्चा लिए वापस नहीं जाऊंगी , उन्होंने कहा तुम्हारी राय उपयुक्त है , हलीमा कहती है : मै उसे लेकर अपने खेमे (शिविर ) में आ गयी , अल्लाह कि क़सम जैसे ही मैने अपने तंबू में परवेश किया मेरे दोनों स्तन दूध से भर गये यहाँ तक कि मैने उनको  (अर्थात अल्लाह के रसूल) (सल्लल्लाहो अलएहे वसल्लम) और उनके दूध शरीक भाई को पेट भर कर दूध पिलाया , और उनके पिता उंटनी के समीप गये तो देखा कि उस का थन दूध से भरा हुआ है , उन्हों ने उसे दूहा , मुझे पेट भर कर पिलाया तथा खुद भी पिया उन्होंने कहा : ऐ हलीमा अल्लाह कि क़सम ! मुबारक जान मिली है . अल्लाह ने उसके कारण हमें वो सब कुछ दिया है जिसकी हम आशा नहीं करते थे . हलीमा कहती है : हम उस रात चैन कि नींद सोए . पहले तो हम अपने बच्चे के साथ रात को सो नहीं पाते थे. फिर हम लोग सुबह के समय अपने ईलाक़े कि तरफ वापस चल पड़े मै अपनी    सफेद गधि पर सवार हुई और आप को अपने साथ सवार कर लिया , उस अल्लाह कि क़सम जिस के हाथ में हलीमा कि प्राण है ! मै सारी औरतों से आगे बढ़ गयी वो कहने लगीं : हलीमा तनिक हमारा ख्याल करो , क्या यह वही गधि नहीं है जिस पर तुम सवार होकर अपने घर से चलीं थीं ? मैने कहा : हाँ , उन्होंने कहा : जब हम चले थे तो इस के घुटने ज़ख़्मी हो गए थे , अब ये बदलाव कहाँ से आ गया ? मै ने कहा : अल्लाह कि क़सम मैने इस पर एक मुबारक लड़के को अपने साथ बीठाया हुआ है हलीमा कहती है   : जब हम वहाँ से निकले तो अल्लाह हर दिन हमारे लिए खैर तथा भलाई में वृद्धि करने लगा , और जब हम अपने गांव वापस आए तो पूरा ईलाक़ा सूखा ग्रस्त था लोगों के चरवाहे बकरियाँ ले कर सुबह को जाते तथा संध्या को वापस आते किंतु उनकी बकरियाँ वैसी ही भूकि रहतीं , लेकिन मेरी बकरियाँ पेट भर कर दूध से भरी हुई वापस आतीं हम उन्हें दूहते और पीते,हलीमा कहती है : आप बड़ी तेज़ी से परवरिश पा रहे थे, जब आपने दो वर्ष पूरे कर लिए तो मै और मेरा पति उनको लेकर मक्का आए , हम आपस में कहते थे कि अल्लाह कि क़सम हम इस बच्चे को अपने आप से कभी अलग नहीं करेंगे , अतः जब हम आप की माता के पास आए तो उनसे कहा : अल्लाह की क़सम ! हम ने कभी इस से ज़्यादा बरकत वाला बच्चा नहीं देखा , हमें इस के प्रति मक्का की वबाओं तथा बीमारियों से डर लगता है इस लिए तुम आज्ञा दो कि हम इसे दोबारा अपने संग ले जाएँ , हम बराबर ज़ोर देते रहे यहाँ तक कि उन्होंने आज्ञा देदी और हम उनको लेकर वापस चले आए, फिर चार साल पूरा होने से पहले ही हम उनको उनकी माता के पास छोड़ आए " यहाँ यह बता दें कि हलीमा के चार बच्चे थे जिनके नाम है :अब्दुल्लाह ,हुज़ाफा ,अनिसा तथा शएमा , अतः ये चारों आप के रेज़ाई अर्थात दूध शरीक भाई हुए

आप का स्तनपान

जब आप का जन्म हुआ तो उम्मेअयमन जो आप के पिता अब्दुल्लाह की नौकरानी थीं उन्हों ने आप की देख भाल तथा पर्वरिश की , जब आप बड़े हुए तो आप ने उनको आज़ाद कर दिया और उनका विवाह अपने चहेते आज़ाद किय हुए गुलाम जैद पुत्र हरसा से कर दी जिन से ओसामा पैदा हुए
आप की माता के बाद जिस औरत ने सब से पहले आप को दूध पिलाया उनका नाम सोअयबा है जो आप के चाचा अबुलहब की लोंड़ी थी उस समय उनका पुत्र भी दूध पी रहा था जिसका नाम मसरूह था , इस से पश्चात सोअयबा आप के चाचा हमज़ा को भी दूध पीला चुकी थी , तथा आप के बाद अबुसलमा पुत्र अब्दुल असद मखज़ूमी को भी दूध पिलाया , इस तरह इस्लामी क़ानून के मुताबिक़ यह तीनों आप के रेज़ाई (दूध शरीक ) भाई हुए
यह अबुलहब की वहीं लोंड़ी है जिसको उसने आप के जन्म के समय खुशी से आज़ाद कर दिया था लेकिन बाद में जब आप ने इस्लाम का प्रचार आरंभ किया तो सब से बड़ा दुश्मन बन गया तथा आप को तरह तरह से सताने तथा तकलीफ़ देने लगा

गुरुवार, 10 जून 2010

आप का नाम

जब आप का जन्म हुआ तो आप की माता ने आप के जन्म की खुशख़बरी आप के दादा अब्दुल मुत्तलिब के पास भेजी , आप के दादा आप के पास आए और गोद में ले कर खाना काबा में गये तथा अल्लाह का धन्यवाद किया और आप के लिए प्रार्थना की तथा सातवें दिन आप का अक़ीक़ा किया, क़बीला क़ुरैश का भोज किया और आप का ख़तना किया एवम् आप का नाम मुहम्मद रखा जिसका मतलब होता है : जिस की खूब तारीफ़ की जाए और संसार में उस का नाम बुलंद हो.  तथा आप की माता ने आप का नाम अहमद रखा , जिसका मतलब होता है :  ईश्वर् की सब से ज़्यादा तारीफ करने वाला जिस की तरह अल्लाह की तारीफ और कोई न कर सके. जब अब्दुल मुत्तलिब ने आप के अक़ीक़े का भोज किया तो क़बीले के लोगों ने उन से प्रश्न किया कि आप ने अपने इस पोते का  नाम क्या रखा है ? तो उन्होंने कहा : ( मुहम्मद) , तो क़बीले वालों को इस नाम पर आश्चर्य हुआ क्योंकि यह एक अनोखा तथा नया नाम था जो कभी सुनने में नहीं आया था . उनलोगों नें उन से पूछा कि आख़िर बाप दादा कि रीति रवाज से हट कर आपने अपने पोते का नाम क्यों रखा बाप दादाओं के नाम पर क्यों नहीं रखा ? अब्दुल मुत्तलिब ने   उत्तर दिया कि : मैने इसका नाम मुहम्मद इसलिए रखा ताकि अल्लाह आसमान में इसकी तारीफ करे और ज़मीन पर बसने वाले ज़मीन पर इसकी तारीफ करें .

शनिवार, 29 मई 2010

हाँथी वाली सेना तथा उसका का अंत

हुआ यूँ कि जब अब्रहा अश्रम नामी ईसाई जो कि हबशा के महाराजा कि तरफ से यमन का गवर्नर था ने देखा कि समस्त अरब लोक काबा कि श्रद्धा में हज्ज करने मक्का जाता है तो उस ने यमन में एक अती सुंदर एवम् महान घर बनवाया तथा लोगों को उस की ज़ेयारत तथा यात्रा पर उभारा ताकि अरबों को काबा की ज़ेयारत से रोका जाए
जब अरबों को इस का ज्ञान हुआ तो यह बात उन पर कठिन गुज़री अतः एक अरबी आदमी ने उस गीरजा में घुस कर उसे गंदा कर दिया जिस से अब्रहा बहुत ज़्यादा क्रोध में आ गया और उस ने क़सम खाई कि वह काबा को विध्वंस कर देगा और एक बहुत बड़ी सेना लेकर मक्का की तरफ चला जिस की तादाद साठ हज़ार से अधिक बताई गई हॅ और वह स्वयं एक वीशाल हांथी पर सवार हुआ
जब अब्रहा मक्का से दो मील पश्चात मोगाम्मस नामी स्थान पर पहुँचा तो अपने दूत को मक्का के सरदार एवम् मुखिया अब्दुल मुत्तालिब के पास इस संदेश के साथ भेजा कि हम लोग तुम से यूद्ध करने नहीँ आए बल्कि हमारा इरादा खाना काबा को विध्वंंश करना है अब्दुल मुत्तलिब ने उत्तर दिया कि हम भी उनका मुक़ाबला नहीं करना चाहते क्योंकि हमारे पास इतनी शक्ति नहीं है जिस से अब्रहा का मुक़ाबला कर सकें यह घर अल्लाह का घर है वही उसे बचाएगा ,फिर अब्रहा के दूत ने कहा कि मेरे साथ अब्रहा के पास चलो उसने तुम्हे बुलाया हॅ अब्दुल मुत्तलिब अब्रहा के पास गये जब अब्रहा ने उन को देखा तो उनकी काफ़ी आव भगत तथा आदर सम्मान किया क्योंकि वह काफ़ी सुंदर तथा भावी व्यक्तित्व के मालिक थे ,अब्रहा ने अपने अनुवादक से कहा : इस से पुछो कि तुम क्या चाहते हो ? अब्दुल मुत्तलिब ने कहा मेरा दो सौ ऊँट लौटा दो जिन्हें पकड़ रखा है !जब अब्दुल मुत्तलिब ने यह बात कही तो अब्रहा को आश्चर्य हुआ और अब्दुल मुत्तलिब की हैसियत उस की
नज़रों में कम हो गई और उसने कहा कि तुम मुझ से दो सौ ऊँटों कि बात कर रहे हो और उस घर का नाम तक नहीं लेते जो तुम्हारा और तुम्हारे पुरखों का धर्म है और जिसे मै ध्वस्त करने आया हूँ अब्दुल मुत्तलिब ने उस से कहा : मैं केवल ऊँटों का मालिक हूँ उस घर का मालिक अल्लाह है वही उसको बचाएगा
अब्दुल मुत्तलिब जब वहाँ से वापस आए तो क़ुरेश वालों को एकट्ठा किया और उनको पूरी बात सुनाई एवम् उनको पहाड़ों आदि में चले जाने को कहा तथा स्वयं कुछ गिने चुने लोगों को लेकर खाना काबा के पास गये और उस के द्वार की कुण्डी पकड़ कर काबा की हिफ़ाज़त के लिए अल्लाह से खूब प्रार्थना की और अब्रहा की सेना के खिलाफ मदद माँगी फिर उसके उपरांत अपने लोगों मे वापस हो गये तथा पार्तीक्षा करने लगे कि अब्रहा मक्का में दाखिल हो कर क्या करता है
अब्रहा की सेना जब मीना एवम् मुज़दलफ़ा के बीच पहुँची तो अचानक सागर की तरफ से अबाबील नामी चीड़ीयों की एक झुंड आई और उन पर कंकर बरसा कर उनका नाश करने लगी हर चीड़या तीन कंकर उठाए हुए थी एक चोंच में और दो अपने दोनों पावं में अब्रहा की सेना में भगदड़ मच गयी और सेना के लोग मर मर कर गिरने लगे अब्रहा को भी उसके नाम का पत्थर लगा और उसका नाश हो गया

आप का जन्म

मक्का में आप का जन्म अरबी तारीख की नौ रबिउल अव्वल को सोमवार के दिन सुबह के समय हुआ जो की अँग्रेज़ी तारीख का २० या २२ अप्रेल सन ५७१ ईस्वी बनता है लोगों में बारह रबीउल अव्वल मशहूर है लेकिन अध्ययन के पश्चात ९ रबीउल अव्वल ही सही मालूम होता हॅ जिसे बड़े बड़े अध्ययन कर्ताओं ने बयान किया है जिन में अल्लामा शिबली नोमानी , अल्ल्लामा सलमान मंसूरपुरी , एवम् मौलाना सफिउर रहमान मोबारकपुरी आदि क़ाबिले ज़िक्र है
जब आप का जन्म हुआ तो आप की माता के जिस्म से एक नूर निकला जिस ने शाम नामी मुल्क के महलों को रौशन कर दिया
ये वहीं साल है जिस में यमन के गवर्नर अब्रहा अश्रम ने खाना काबा को ढाने के लिए मक्का पर चढ़ाई कीया था और अल्ल्लाह ने अबाबील नामी चिड़ियों के ज़रिए उनका सर्वनाश कर दिया था

मंगलवार, 4 मई 2010

आप के पिता अब्दुल्लाह

आप के पिता अब्दुल्लाह अतिसुंदर तथा पवित्र चरित्र के मनुष्य थे इनको " ज़बीहुल्लाह " अर्थात " जिसे इश्वर के लीए बलि दिया गया हो " भी कहा जाता है "
हुआ यूँ कि इनके पिता अब्दुल मुत्तलिब ने ज़मज़म का कुँआ खोदा और जब कुआँ दिखने लगा तो क़ुरेश से उन का झगड़ा हो गया उस समय उन्होंने यह नज़र मानी कि अगर अल्लाह ने उन्हें दस बेटे दिए तो उन में से एक को अल्लाह के लिए काबा के समीप ज़बह कर देंगे तो जब उनके दस लड़के हो गये तो उन्होंने उनके नाम की पर्ची निकाली पर्ची अब्दुल्लाह के नाम निकली अब्दुल मुत्तलिब उनको लेकर काबा के पास पहुँचे ताकि उनकी बलि दे तो उनके परिवार के लोगों ने एवम् विशेष रूप से उनके ननिहाल वालों ने उनको मना किया तो अब्दुल मुत्तलिब ने उनके फिदिया ( बदले ) में एक सौ उंटों को ज़बह किया पहले उन्हों ने दस उंटों को रख कर पर्ची निकाली पर्ची फिर अब्दुल्लाह के नाम निकली वो बराबर उंटों की संख्या बढ़ाते गये यहाँ तक क़ि उंटों क़ि संख्या एक सौ हो गयी तो पर्ची उंटों के नाम निकली इस तरह अब्दुल मुत्तलिब ने उनके बदले में एक सौ उंटों को ज़बह किया इसी लिए मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्ल्म को " इबनुज़्ज़बीहतैन " अर्थात " दो ज़बह किए गये महापुरुषो के पुत्र" कहा जाता है
अब्दुल मुत्तलिब ने अपने पुत्र अब्दुल्लाह का विवाह बनू ज़ोहरा के मुखिया एवम् सरदार वहब पुत्र अब्दे मोनाफ की पुत्री आमना से कर दिया जो की आदर एवम् संस्कार में क़ुरेश की महिलाओं में सर्वोत्तम थीं शादी के कुछ समय उपरांत अब्दुल मुत्तलिब ने उनको व्यापार के लिए मूलके शाम भेजा वापसी में मदिना में उनका देहांत हो गया और एक क़ौल " कथनी" के अनुसार उनको मदीना ख़ज़ूर लाने के लिए भेजा था जहाँ उनका देहांत हो गया, तथा वहीं पर उनको दफ़न कर दिया गया

शनिवार, 1 मई 2010

आप का नसब नामा /वंश

मुहम्मद( सललाल्लाहो अलैहे वसल्ल्म) पुत्र अब्दुल्लाह पुत्र अब्दुल मुत्तलिब पुत्र हाशिम पुत्र अब्दे मोनाफ पुत्र क़ोषई पुत्र कोलाब पुत्र मुर्रा पुत्र काब पुत्र लोवाए पुत्र ग़ालिब पुत्र फहर पुत्र मालिक पुत्र नज़र पुत्र कनाना पुत्र खोज़ईमा पुत्र मूद्रेका पुत्र इल्यास पुत्र मोज़र पुत्र नज़ार पुत्र मअद पुत्र अदनान
यहाँ तक आपके वंश में सब सहमत हैं , अदनान के बाद थोड़ी विभिन्नता है अलबत्ता सब इस बात पर सब सहमत हैं की अदनान इस्माईल अलैहिस्सलाम की औलाद हैं

काबा का निर्माण और इब्राहीम की प्रार्थना

अगली बार जब इब्राहीम अलैहिस्सलाम मक्का आए तो अपने पुत्र इस्माईल अलैहिस्सलाम से कहा कि अल्लाह ने मुझे हुक्म दिया है कि इस जगह एक घर बनाऊँ , इस्माईल अलैहिस्सलाम ने कहा कि आप के रब ने जो हुक्म दिया है उसे कर डालिए फिर दोनों ने मिल कर अल्लाह के घर खाना काबा का निर्माण किया इस्माईल अलैहिस्सलाम पत्थर ढो कर लाते और इब्राहीम अलैहिस्सलाम उन्हें जोड़ते , जब इमारत उँची हो गई तो इस्माईल अलैहिस्सलाम ने एक पत्थर ला कर उन के पैरॉ के नीचे रख दिया और इब्राहीम अलैहिस्सलाम उस पर खड़े हो कर काबा का निर्माण करने लगे वो पत्थर जिस पर चढ़ कर इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने काबा का निर्माण किया था काबा की दीवार के नीचे रह गया ,उस पर इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पैरो के निशान भी रह गये जिसका नाम अल्लाह ने " मक़ामे इब्राहीम " रख दिया, काबा के निर्माण के बाद उन्होंने अल्लाह से निम्न प्रार्थना की
१- इस घर को उनकी तरफ से क़बूल कर ले
२- दोनों इस्लाम धर्म पर बाक़ी रहें
३- इस्लाम धर्म पर ही उनकी मौत हो
४- उनके बाद उनकी औलाद इस घर क़ी वारिस बने
५- इस दावते तौहीद (केवल एक अल्लाह क़ी पूजा) को सारे संसार में फैला दे
६- उन क़ी औलाद में एक नबी (दूत) भेजे
७- अपनी पूजा एवम् इबादत का सही तरीक़ा एवम् विधि सीखा दे
८- उन्हें क्षमा दे दे
९- काबा को सुरक्षा एवम् शांति वाला स्थान बनाए
१०- उनकी औलाद को बुतपरस्ती से बचाए
११- एवम् उन्हें विभिन्न प्रकार के फलों से आजीविका प्रदान करे
फिर इब्राहीम अलैहिस्सलाम को अल्लाह ने हुक्म दिया कि लोगों में हज का एलान कर दें सो उन्होंने एलान कर दिया और लोग उनकी आवाज़ सुन कर पूरी दुनिया से लोग हज करने के लीए आने लगे जिस का सिलसिला आज तक जारी है और शायद क़यामत तक जारी रहे
इसके बाद इब्राहीम अलैहिस्सलाम शाम देश को लौट गए और सत्य धर्म के परचार में लग गये यहाँ तक कि एक सौ पचहत्तर वर्ष कि आयु में उनका देहांत हो गया
देहांत के समय उनके दो पुत्र इसहाक़ अलैहिस्सलाम और इस्माईल अलैहिस्सलाम थे इसहाक़ अलैहिस्सलाम शाम में ही रह गए और उन्होंने फ़लस्तीन में मस्जीदे अक़्सा का निर्माण किया बाद में मुहम्मद सललाल्लाहो अलैहै वसल्लम को छोड़ कर जीतने भी नबी और दूत आए उन्हीं कि नस्ल में आए और मुहम्मद सललाल्लाहो अलैहै वसल्लम उनके दूसरे एवम् बड़े पुत्र इस्माईल अलैहिस्सलाम कि नस्ल में आए.
इस्माईल अलैहिस्सलाम मक्का में काबा के पड़ोस ही में क़बीला जुरहूम कि एक लड़की से विवाह करके उनके साथ बस गए और फिर अल्लाह ने उनको , उनका और यमन वालों का नबी बना दिया. एक सौ सैंतीस वर्ष कि आयु में मक्का ही में उनका देहांत हो गया इस्माईल अलैहिस्सलाम को अल्लाह ने बारह बेटे दिए जिन में नाबीत एवम् कैज़ार माशहूर हुए तथा कैज़ार की औलाद में अदनान हुए अदनान के दो बेटे हुए अक तथा मअद , अक यमन चला गया और मअद मक्का में ही रहा जिन की नस्ल से मुहम्मद सललाल्लाहो अलैहै वसल्लम हैं

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

इस्माईल की क़ुर्बानी

इब्राहीम अलैहिस्सलाम इश्वर के दूत थे और अपने कर्तव्य के पालन के लिए अल्लाह के हुक्म से अनेक देशों की यात्रा करते रहते थे और अपनी पत्नी एवम् पुत्र की देख रेख के लिए कभी कभार मक्का आया करते थे अल्लाह ने उनको एक बार सपने में दिखाया की वो अपने बेटे इस्माईल अलैहिस्सलाम की क़ुर्बानी कर रहे हैं ( यहाँ यह बता दें की नबीयों का सपना ईश्वरीए हुक्म हुआ करता है ) अतः इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने इस ईश्वरीए हुक्म को अपने प्रीय एवम् एक्लओते पुत्र के समच्छ रखा जो उस समय तेरह बरस की आयु को पहुँच चुके थे , उन्होंने फ़ौरन जवाब दिया की आप को ईश्वर ने जो आज्ञा दिया है उसे तुरंत कर डालिए अगर ईश्वर ने चाहा तो आप मुझे सब्र करने वाला(धैर्य वाला) पाएँगे ईश्वर के लिए सब कुछ क़ुरबान कर देने वाले पिता और पुत्र ईश्वर की आज्ञाकारिता के लिए चले ऐसा अनुपालन , अल्लाह के समक्ष ऐसा आत्मसमर्पण एवम् ऐसी तपस्या इतिहास के पन्नों में ढूढ़ने से नही मिलेगी इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने छुरी लिया और इस्माईल अलैहिस्सलाम को माथे के बल लिटाया फिर अल्ल्लह का नाम लेकर छुरी को इस्माईल अलैहिस्सलाम की गर्दन पर चलाया लेकिन छुरी काट न सकी उसी समय अल्लाह ने पुकारा : ऐ इब्राहीम ! तूने ख्वाब को सच कर दिखाया फिर अल्लाह ने इस्माईल अलैहिस्सलाम के बदले एक बड़ा जानवर भेज दिया ताकि उसकी क़ुर्बानी कर सकें इसी का वर्णन अल्लाह तआला ने क़ुरान मजीद के अंदर इन शब्दों में किया है: ( हम ने इब्राहीम को पुकारा की ऐ इब्राहीम ! तूने खवाब को सच कर दिखाया हम नेक लोगों को ऐसा ही बदला ( पुरस्कार ) देते हैं , यह एक खुली हुई परीक्षा है , और हम ने उस लड़के के फीदीया (बदले) में एक बड़ा जानवर भेज दिया )
इस पुण्य को अल्लाह तआला ने इस्माईल अलैहिस्सलाम की नस्ल में और अपने रसूल मुहम्मद सललाल्लाहो अलैहै वसल्लम की उम्मत में क़यामत तक के लिए जारी कर दिया जिसे पूरे विश्व में करोड़ों मुसलमान पर्ति वर्ष मनाते हैं

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

मक्का आबाद होता है

इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने ईश्वर् के हुक्म से अपनी पत्नी हाजरा अलैहस्सलाम एवम् पुत्र इस्माईल अलैहिस्सलाम को लेकर वादी ए मक्का में गए और उन्हें वहीं छोड़ कर चलने लगे तो उनकी पत्नी ने पूछा कि हमे इस गैर आबाद स्थान पर किसके भरोसे छोड़ कर जा रहे हैं, क्या ईश्वर ने आप को इसका हुक्म दिया है ? तो उन्होंने उत्तर दिया कि हाँ ईश्वर् ने ही इसका हुक्म दिया है ! तो हाजरा अलैहस्सलाम ने कहा : तब मै ईश्वर् के हुक्म से राज़ी हूँ इस के बाद इब्राहिम उनके लिए एक थैली में कुछ खाने का सामान और पानी का एक घड़ा रख कर उन से विदा हो गए! और फिर हाजरा अलैहस्सलाम अपने नन्हे से पुत्र के साथ वहाँ अकेली रह गयीं , फिर जब घड़े का पानी ख़तम हो गया और दोनों प्यासे हुए तो हाजरा अलैहस्सलाम पानी कि खोज में सफा और मरवा नामी पहाड़ीओं के बीच चक्कर काटने लगी ताकि कुछ पानी मिल जाए इस बीच वो अपने पुत्र को बार बार देखने भी आ जाती थी इस तरह उन्हों ने इन पहाड़ीओं के बीच कुल सात चक्कर लगाए फिर अचानक देखती हैं कि बच्चे के दोनों पावं के नीचे से एक पानी का चश्मा फुट पड़ा है यह देखते ही वो दौड़ी हुई आईं और पानी को पत्थरों और मिट्टी से घेरने लगीं ताकि पानी इधर उधर बह न जाए ! इस तरह ज़मज़ंम का कुवा बना और उस का पानी बहुत ज़्यादा हो गया जिसे आज तक पूरी दुनिया के हाजी पीते भी हैं और अपने साथ अपने देश भी ले जाते हैं !
एक दिन यमन के क़बीला जुरहूम का गुज़र इस वादी से हुआ ये लोग पहले भी इस रास्ते से यात्रा किया करते थे , इन्होंने क़रीब ही परिंदों को उड़ते हुए देखा तो अपने एक आदमी को खबर लाने के लिए भेजा तो उसने पानी कि खबर दी ये लोग कुएँ के पास आकर हाजरा अलैहस्सलाम से वहाँ आकर आबाद होने कि इजाज़त माँगी तो उन्होंने इस शर्त पर उनको इजाज़त दे दी कि इस पानी पर उन लोगों का हक नहीं होगा ! इस तरह उस वक़्त मक्का आबाद हुआ और गुज़रते समय के साथ उसकी आबादी बढ़ती चली गयी !

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

धार्मिक स्तिथि

अरब समाज में बुत परस्ती आम थी उनमें सितारों की पूजा भी की जाती थी दक्षिणी भाग के अरब क़बाईल सालुसे मुक़द्दस ( Holy Trinity ) पर यकीन रखते थे जो चन्द्रमा , सूर्य एवं जोहरा से मिलकर बनते थे
फिर जब अल्लाह ने अपने दूत इस्लामाईल अलैहिस्सलाम को नबी बना कर भेजा तो वोह केवल एक अल्लाह की पूजा करने लगे और एक ज़माने तक इसी धर्म पर कायम रहे एवं कई सदियों के बाद दोबारा बुत परस्ती उन में लौट आई और यह फिर से बुत परस्त बन गए इस्माईल अलैहिस्सलाम की औलाद में मुद्रका के पुत्र होजैल और उस के बेटों ने सब से पहले बुत बनाया और उसे यंबो नमी शहर में रखा इस बुत का नाम सुवा था इसी तरह दुमातुल्जन्दल नमी देश में वाब्र के बेटे कल्ब ने वुद्द नमी बुत बनाया इसी तरह तै नामी कबीले में यगुस और यमन के हमदान नामी इलाके में यऊक तथा हमीर में नसर नामी बुत बनाया गया
इसी तरह तमीम , ओमान बहरेन एवं कुछ अरब क़बीलों में मजुसिअत ( अग्नि पूजा करने वाले) फैली हुई थी इनका अकीदा था कि संसार को दो शक्ति(किरण तथा अंधकार या पुण्य तथा पाप ) मिलकर चलाती है
इनके अलावा यमन तथा हिजाज़ में यहुदिअत एवं ईसाइयत भी पहली हुई थी और कुछ भागों में तो इनका बर्चस्व कायम था

अरबों की अच्छी और बुरी आदतें

अच्छी आदतें : अरबों के अन्दर ढेर सारी अच्छी आदतें थीं जिन पर उन्हें गर्व था उनकी उन उच्छी आदतों में से कुछ निम्न हैं :
१ - सखावत एवं फैयाजी में यह बहुत मशहूर थे सूखे और क़हत्साली के दिनों में भी मेहमानों के लिए अपनी सवारी का ऊंट ज़बह कर दिया करते थे
२ - दियत ( क़त्ल के बदले में तय्शुदः रकम अदा करके बदले में क़त्ल किया जाने से बचना ) की बड़ी बड़ी रकमों एवं दूसरो के कर्जों का बोझ उठाते
३ - बेसहारों और परीशां हालों की मदद करते
४ - कमजोरों की हिमायत करते
५ - ताक़त और कुदरत रखते हुए बदला नहीं लेते
६ - सत्यता एवं अमानत का बहुत ज्यादा ख्याल रखते
७ - जिल्लत और रुसवाई को बर्दाश्त नहीं करते
इनके अलावा भी इनके अंदर बहुत सारी अच्छी आदतें थीं
बुरी आदतें
१ - बदकारी
: अरब समाज में पराई महिलाओं के साथ बदकारी(जिनाकारी ) एक आम बात थी अक्सर अरब इस पाप की तरफ अपनी निस्बत करने में कोई आर और शर्म महसूस नहीं करते थे यह बुराई आम तौर पर लोंडियों में ज्यादा पाई जाती थी
वहीं पे बहुत सारे अरब के शरीफ व्यक्तियों के नज़दीक स्त्री का बहुत ऊँचा स्थान था एवं इन में औरतों के पर्ति काफी श्रद्धा पाई जाती थी ऐसे घरानों में औरतें स्वयं अपना वर चुनती थीं एवं ससुराल में अभद्र व्यवहार पर उन्हें छोड़ कर माइके चली जाती थीं यह अपनी औरतों की हिफाज़त के लिए अपनी जान तक लड़ा देते थे उनको लड़ाईयों में ले जाते ताकि उनका हौसला बढाएं
२- लड़कियों को जिंदा ज़मीन में गाड देना : यह बुराई अरब में आम थी क्योंकि लड़की का पैदा होना इनके यहाँ आर और शर्म की बात थी उनकी पैदाइश पर मुंह छुपाते फिरते थे एवं इन्हें जिंदा ज़मीन में गाड देते थे ,अल्लाह ताआला इनकी हालात का वर्णन करते हुए कहता है : " जब इनको बेटी के ( जन्म ) की खुशखबरी (सुसमाचार) दी जाती है तो इनका चेहरा काला पड़ जाता है अतः वोह ग़म से निढाल हो जाता है इस बुरी खबर कि वजह से लोगों से छुपा फिरता है सोचता है कि क्या उसको जिल्लत ( अपमान ) के साथ रखे अथवा उसे मिट्टी में गाड दे " (कुरआन मजीद सुरः नहल /58 - 59)
इनके इस घिनावने कार्य की सजा अल्लाह तआला उनको कियामत के दिन ज़रूर देगा फरमाता है :" जब जिंदा ज़मीन में गाड दी गई लड़कियों से(कियामत के दिन ) पूछेगा कि तुन्हें किस पाप के बदले मार डाला गया " (सुरः तक्वीर ८ – 9 )
३ - शराब : शराब उनकी घुट्ठी में पड़ी थी कुछ जनों को छोड़ सभी इस बुराई में लिप्त थे
४ - विवाह के लिए कोई हद नहीं थी जितनी औरतों से चाहते शादी कर लेते यहाँ तक कि इसलाम ने आकर इसे चार में महदूद कर दिया
५ - कोई आदमी दो सगी बहनों से विवाह कर के एक साथ दोनों को रखता
६ - अगर कोई आदमी अपनी पत्नी को तलाक दे देता या या वोह आदमी मर जाता तो उसका बेटा उस से शादी कर लेता
७ - कभी दस आदमियों से कम लोग एक स्त्री से सम्भोग करते और जब बच्चा पैदा होता तो वोह औरत अपनी सोंच के मुताबिक जिसे चाहती उसका पिता ठहराती
८ - कभी ऐसा होता कि मर्द अपनी पत्नी को माहवारी से निकलने के बाद किसी ऐसे आदमी के पास सम्भोग के लिए भेजता जो बहादुरी एवं अच्छाई में मशहूर होता ताकि बच्चा उसी जैसा पैदा हो
९ - कभी ऐसा भी होता कि दो मर्द सम्भोग के लिए अपनी पत्नियाँ बदल लेते

सामाजिक स्थिति

अरब समाज पुर्णतः तिन भागों में बंटा हुआ था
प्रथम : यह वोह लोग थे जो कबीले के असल पुत्र होते थे एवं कबीले की एक आवाज़ पे मैदान में कूद पड़ते थे
दितिए : कबीले के आजाद किए हुए लोग जिन्हें मवाली कहा जाता था इनके अधिकार भी कबीले के सदस्यों की तरह हुआ करते थे
तृतिय : गुलामों का वर्ग उस समय के क़बाईली समाज में ऐसे लोगों की खासी तादाद हुआ करती थी , ये बहुत से मानव अधिकारों से वंचित हुआ करते थे एवं अपने अकावों और मालिकों की तरफ से बहुत सारी ज़िम्मादारिओं के बोझ तले दबे होते थे यही गुलाम वोह छोटे काम भी किया करते थे जिनको करना अरब अपने लिए शर्म की बात समझते थे जैसे : ऊंट बकरिओं की चरवाही , लोहार ,बढ़ई एवं पछ्नी लगाने का काम

राजनैतिक स्थिति

मुहम्मद सल्लल्लाहोअलैहेवसल्लम के जन्म के समय अरब दीप में दो तरह की हुकूमतें हुआ करती थीं
प्रथम : वोह महाराजा जिन की बाजाप्ता ताजपोशी होती थी लेकिन राजनीती में इनका कुछ ज्यादा अमल दखल नहीं हुआ करता था , इन महाराजाओं में मशहूर हीरा , सिरिया तथा हेजाज़ के बादशाह हैं
दित्तिए : क़बीलों के सरदार या मुखिया जिनकी एक खास राजनैतिक स्थिति हुआ करती थी एवं उन्हीं का हुक्म चला करता था पूरा समाज आका और गुलाम दो वर्गों में बँटा हुआ था कोई ऐसी हुकमत या शक्ति नहीं थी जो कमज़ोर वर्ग के अधिकारों के लिए लड़ सके एवं उनको ऊँचे वर्ग के लोगों के ज़ुल्म एवं अधिकार हनन से बचा सके
इलाके की राजनीती में मक्का की एक खास हैसियत थी चूँकि मक्का हिजाज़ का एक अतिमहत्त्वपूर्ण शहर था इसलिए इलाके की राजनितिक करारदादों में इसका योगदान महत्वपूर्ण हुआ करता था दारुन्नादवा नामी सभागार जो इनका पार्लियामेन्ट था में इकठा होकर यह अपने राजनैतिक ,धार्मिक एवं आर्थिक फैसले लिया करते थे इस सभा में चालीस वर्ष से कम आयु का व्यक्ति दाखिल नहीं हो सकता था इस सभा के सदस्यों का चुनाव उनकी दौलत एवं पूर्व की सेवाओं के आधार पर होता था, बहुत से अरब कुरैश के सरदारों को सिरिया और फारस के राजाओं से बेहतर एवं बालातर समझते थे यहाँ यह बता देना महत्वपूर्ण है की अरब हमेशा स्वतंत्र रहे हैं और कभी किसी बाहरी हुकूमत का कब्जा इन के उपर नहीं हुआ है

अरब कि आर्थिक स्थिति

व्यापार अरब के जीवन का एक मज़बूत आधार था जिस से वह अपने जीवन कि ज़रूरतों को पूर्ण किया करते, थे लेकिन पुरे दीप में शांति के आभाव में व्यापार को तरक्की देना एक मुश्किल काम था, अलबत्ता हराम महीनों में यह अपने व्यापार में लग जाते थे जिन में उनके यहाँ लडाई एवं लूटपाट निषेध था, इन्हीं महीनों में इनका मशहूर बाज़ार ओकाज़ , जील्माजाज़ एवं मेजन्नाह लगता था
उद्योग में भी यह दोसरी कौमों से अति पिछडे हुए थे हीरा, सिरिया एवं येमन के कुछ भागों में बुनकारी और रंगरेजी आम थी खेती एवं मवेशिपालन इनका असल काम था जिनसे इनका जीवन व्यतीत होता था, वरन आम तौर पर इनका जीवन ग़रीबी एवं मुहताजी में ही व्यतीत होता था

अरब की स्थिति

मुहम्मद सल्लल्लाहोअलैहेवसल्लम के जन्म के समय पूरी दुनिया और खास तौर से अरब जीवन के हर भाग में अतिपिछडा हुआ था ! यहाँ पर अरब की स्थिति का वर्णन अनिवार्य है, ताकि विश्व को आप की ज़रुरत को समझने में आसानी हो, और यह भी समझने में आसानी हो कि अरब में आप का पैदा होना विश्व के लिए कितना फायदामंद रहा ! इस सन्दर्भ में हम निम्न में उस समय में अरब की विभिन्न छेत्रों एवं वर्गों में आर्थिक , समाजिक ,राजनैतिक एवं धार्मिक स्थिति का वर्णन सारांश में कर रहे है

रविवार, 11 अक्टूबर 2009

जहाँ आप पैदा हुए

: अरब
आप की पैदाइश अरब प्रायद्वीप में हुई जो दक्षिण पश्चिम एशिया में तीन तरफ
: पूरब , पश्छिम एवंम दक्षिण ) से सागरों से घिरा हुआ है , जिसकी चौहद्दी कुछ इस प्रकार है )
पूरब में ओमान सागर एवं अरब खाड़ी,पश्छिम में लाल सागर( कुल्ज़ुम सागर ) फिर सीनै प्रायद्वीप , दक्षिण में हिंद महासागर एवं अदन की खाड़ी एवं उत्तर में शाम एवं ईराक के कुछ देश हैं
अरब द्वीप पॉँच प्रकार के हैं : - (१) तेहामा : यह सरात नाम की पहाडी का पश्चिमी भाग है जो लाल सागर के सामने है इस का ज्यादह तर भाग रेतीला , गरम और कम हरयाली वाला है !
२- नज्द : यह सरात पहाडी का पूर्वी भाग है और पश्चिमी भाग से बड़ा है , सरज़मीन नज्द भी दो प्रकार के हैं
१) ऊंचाई वाला भाग जो हिजाज़ से सटा हुआ है )
२) निचला भाग जो इराक से सटा हुआ है )
(३- हिजाज़ : यह सरात पहाडी का उपरी भाग है , इस के मशहूर शहरों में से मक्का , मदीना एवं तायेफ़ है !
४- ओरूज़ : यह यमामा , बहरैन एवं उन से सटे हुए इलाकों का नाम है
५- यमन : यह अरब दीप का दक्षिणी भाग है

अरब क़ौम
:इतिहासकारों ने अरब कौमों को तीन भागों में बांटा है
१- अरब बाइदा : यह सब से पुरानी अरब क़ौम है जिनका इस धरती से नामोनिशान मिट चूका है , इन कौमों में मशहूर : आद ,षमूद , तस्म , जदीस , इम्लाक , जुर्हुम , हजूर एवं हज़र्मूत आदि हैं
(२- अरब आरेबा : इनका दूसरा नाम कहतानी अरब भी है , यह यारुब के बेटे यश्जुब की वंश से हैं इनकी ज्यादा तर आबादी यमन में रही , फिर इनकी जनजातियाँ अरब द्दीप के भिन्न छेत्रों में फ़ैल गईं इन्हीं में से एक जुर्हुम नामी काबीला था जो इस्माईल अलैहिस्सलाम की माता हाजरा अलैहास्सलाम की सहमती से मक्का में ज़मज़म कुआँ के पास बस गया था
३- अरब मुस्तारेबा : इनका दूसरा नाम अदनानी अरब है , यह पैग़म्बर इस्माईल अलैहिस्सलाम की वंश से हैं , यहाँ यह बता दें की पैग़म्बर इस्माईल अलैहिस्सलाम के पिता पैग़म्बर इब्राहीम अलैहिस्सलाम अरबी नस्ल(वंश) से नहीं थे बल्कि यह इराक में बाबुल नामी स्थान के रहने वाले थे फिर हिजरत (प्रवास ) करके शाम (सीरिया) चले गए थे
मक्का
इस्लाम का पवित्रतम शहर है जहाँ पर काबा और मस्जिद-अल-हरम (पवित्र या विशाल मस्जिद) स्थित है। मक्का शहर वार्षिक हज, जो इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक है के लिये प्रसिद्ध है।
इस्लामी परंपरा के अनुसार मक्का की शुरुआत इस्माईल अलैहिस्सलाम ने की थी। 7 वीं शताब्दी में, इस्लामी पैगम्बर मोहम्मद ने शहर में जो तब तक, एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र था मे इस्लाम की घोषणा की और इस शहर ने इस्लाम के प्रारंभिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सन 966 से लेकर 1924 तक, मक्का शहर का नेतृत्व स्थानीय शरीफ द्वारा किया जाता था। 1924 मे यह सउदी अरब के शासन के अधीन आ गया।
आधुनिक मक्का शहर सउदी अरब के ऐतिहासिक हेजाज़ क्षेत्र में स्थित है। शहर की आबादी 1700000 (2008) के करीब है और यह जेद्दा से 73 किमी (45 मील) की दूरी पर एक संकरी घाटी में समुद्र तल से 277 मीटर (910 फीट) की ऊँचाई पर स्थित है।
पवित्र मक्का आबाद होता है
अल्लाह के पैग़म्बर इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपनी पत्नी हाजरा अलैहस्सलाम एवंम अपने पुत्र इस्माईल अलैहिस्सलाम को अल्लाह की आज्ञा से मक्का शहर में पवित्र काबा के पास बसा दिया उस समय वहां मीलों तक कोई आबादी नहीं थी फिर ज़मज़म का कुवां फूटने के बाद जुर्हुम नामी कबीला हाजरा अलैहस्सलाम कि अनुमति से वहां बस गया इन्हीं से इस्माईल अलैहिस्सलाम ने अरबी भाषा सीखी और इसी कबीले की लड़की बस्सामा की बेटी मजाज़ से विवाह कर लिया जिनसे इनको बारह बेटे हुए !
इस्माईल अलैहिस्सलाम की कुर्बानी
इब्राहीम अलैहिस्सलाम अल्लाह के दूत और नबी थे अपनी पत्नी और पुत्र कि खोज खबर के लिए कभी कभार मक्का आते रहते थे उनहोंने एक बार सपने में देखा कि वो अपने अपने पुत्र इस्माईल को ज़बह कर रहे हैं (यहाँ पर यह बता दें कि पैग़म्बर का सपना इश्वर्य आज्ञा (वही) हुआ करता है ) मक्का आकर यह आज्ञा आप ने अपने मासूम पुत्र को सुनाई जो उस वक़्त तेरह बरस के थे तो उनहोंने भी अपने पिता को अल्लाह की आज्ञा को पूर्ण करने को कहा लेकिन जब दोने बाप बेटे अपने जीवन को इश्वर के लिए समर्पित कर दिया और बाप ने बेटे के गले पर छुरी रख दी तो इश्वर ने पुकारा " ऐ ईब्राहीम ! तुम ने अपने सपने को सत्य कर दिखाया हम अच्छे लोगों को इसी तरह ईनाम एवं बदले दिया करते हैं " फिर अल्लाह ने इस्माईल के बदले एक दुंबा दिया जिसकी उनहोंने कुर्बानी करके अल्लाह के लिए खुद को पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया , यह वही कुर्बानी है जिसे उस समय से लेकर कयामत तक अल्लाह ने जारी कर दिया जिसे करोडों इन्सान प्रत्येक वर्ष हज के समय अंजाम देते हैं !
काबा
इब्राहीम अलैहिस्सलाम को अल्लाह ने मक्का में एक पवित्र घर बनाने का निर्देश दिया और उनहोंने अपने पुत्र की मदद से काबा जैसे पवित्र और महान घर की बुन्याद डाली और कुछ दीनों में इसे पूरा किया इस्माईल अलैहिस्सलाम पत्थर ढोकर लाते और इब्राहीम अलैहिस्सलाम एक पत्थर पर खड़े हो कर दिवार बनाते , जिस पत्थर पर आपने अपना पैर रख कर काबा का निर्माण किया उस पर आज भी उनके पैरों के निशान मौजूद है और इसे मकामे इब्राहीम के नाम से जाना जाता है!
जब काबा का निर्माण हो गया तो इश्वर ने उन्हें सम्पूर्ण विश्व के लिए वहां आकर हज्ज करने का ऐलान करने को कहा अतः उस समय से अब तक लोग विश्व के कोने कोने से आकर हर साल लाखों की तादाद में हज एवं ज़ेयारत करते हैं ! एवं पुरे विश्व के मुसलमानों को अल्लाह ने उसी काबा की तरफ मुंह करके नमाज़ पढने का आदेश दिया है !