ख़तना और मानव शरीर

ख़तना की इस्लामी अवधारणा

एवं मानव शरीर पर इसके प्रभाव 

भूमिका:

डॉ.अजय कुमार बिहार के प्रसिद्ध मूत्र रोग विशेषज्ञ (Urologist) हैं , वह यूरोलॉजी सोसाइटी ऑफ इंडिया और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे हैं, अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने पुरुषों के  ख़तना, इसके लाभ और वर्तमान युग में इसकी आवश्यकता और महत्व के बारे में संक्षेप में लेकिन विस्तार से बात की। उपरोक्त साक्षात्कार में डॉक्टर साहब ने ख़तना के जिन फायदों का विशेष रूप से उल्लेख किया है वे चिकित्सा से संबंधित हैं। अपने अनुभवों के आधार पर उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि कभी-कभी पुरुषों में कुछ ऐसी चिकित्सीय स्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जिनमें ख़तना अनिवार्य हो जाता है। इस संबंध में डॉक्टर साहब ने जिन बातों की ओर ध्यान दिलाया, उसका सारांश इस  कुछ प्रकार है:     

ख़तना न होने के कारण कई बच्चों में फाइमोसिस Phimosis (चमड़ी का कसाव) नामक बीमारी हो जाती है, जिससे कभी-कभी चमड़ी के अंदर घाव हो जाने या उसके बंद हो जाने, या कभी-कभी पेशाब करते समय मूत्र की बूंदें अंदर रह जाने की शिकायत पाई जाती है, जो किसी गंभीर बीमारी का कारण भी बन सकते हैं। इसी तरह वयस्कों को भी जननांगों की त्वचा में सूजन और ठीक से पेशाब न कर पाने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, ख़ासकर मधुमेह से पीड़ित लोगों में संक्रमण, सूजन या लालिमा की शिकायत हो जाती है, और इसमें से तैलीय द्रव का भी स्राव होता है, जिसे चिकित्सीय भाषा में एस्मेग्मा Esmegma कहा जाता है। अतः ऐसे लोगों के लिंग में अगर एक बार संक्रमण हो जाए तो वह ठीक नहीं होता ,क्योंकि अगर उनका ख़तना नहीं हुआ है, तो लिंग का ऊपरी हिस्सा हमेशा ढका रहता है, जिससे उसमें हवा नहीं जा पाती है। ऐसे मामलों में डॉक्टरों के निर्देशानुसार ऐसे लोगों के लिए ख़तना अति आवश्यक हो जाता है। डॉक्टर महोदय  ने अपने  इंटरव्यू  के दौरान जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही वह यह थी कि ख़तना न कराने की सूरत में यदि लिंग में  एस्मेग्मा Esmegma  जगह बना लेता है तो यह धीरे-धीरे लिंग कैंसर का कारण बन जाता है।    

डॉक्टर साहब ने यह भी कहा कि मुसलमानों और यहूदियों में लिंग कैंसर आम नहीं है, इसका कारण यह है कि इन दोनों धर्मों के लोग ख़तना की व्यवस्था करते हैं, जबकि हिंदुओं में यह बिमारी आम तौर पर देखि गई है,क्योंकि किसी कारणवश उनके बीच ख़तना से दूरी बनाई जाती है। डॉ. कुमार ने इस बात पर जोर दिया कि ख़तना के मामले में धर्म को बीच में नहीं लाया जाना चाहिए,क्योंकि ख़तना एक scientific (वैज्ञानिक और प्रायोगिक) प्रक्रिया है, जिसके लाभ स्पष्ट हैं।

हालांकि डॉक्टर साहब ने अपनी उपरोक्त बातों में लोगों को धार्मिक आधार के बजाय वैज्ञानिक आधार पर ख़तना कराने की सलाह दी, लेकिन यहां एक बात स्पष्ट रहे कि इस्लामी मान्यताओं के अनुसार ख़तना का आदेश अल्लाह सर्वशक्तिमान का आदेश है, जिसके प्रत्येक व्यक्ति के लिए दूरगामी और विशेष लाभ हैं।

विषय के अनुसार हम निम्नलिखित पंक्तियों में ख़तना के बारे में इस्लामी दृष्टिकोण और उसके नियमों एवं लाभों पर संक्षेप में चर्चा करना उचित समझते हैं,क्योंकि उपमहाद्वीप में इस्लामी सभ्यता,संस्कृति तथा उसके नियमों एवं व्यवस्था के विरुद्ध उठाई गई आपत्तियों में से एक मुसलमानों में ख़तना की प्रथा भी है। यहां तक ​​कि कुछ घृणित मानसिकता भरे व्यक्तियों के दिमाग में इस मुद्दे ने इतना विष भर दिया है कि वे इसी कारण से मुसलमानों को "कटुवा" जैसे शब्दों से गालियां देते हैं। इतना ही नहीं भारत के उच्च सदन में भी इस शब्द के ज़रिए कुछ नेताओं ने अपनी मानसिक दिवालियापन का सबूत दिया है। इसलिए हर आदमी एवं ख़ास तौर से मुसलामानों के लिए इस प्राकृतिक प्रतीक और इसके फ़ायदों से परिचित होना ज़रूरी है।

ख़तना क्या है?: 

पुरुष जननांग के गोलाकार भाग के ऊपर की अतिरिक्त त्वचा को काट देना। और महिलाओं की योनि (vagina) में एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण यौन अंग (clitoris) के बाहरी भाग को काट देना ख़तना कहलाता है। अरब देशों में ख़तना करने को सामान्यतः तत्हीर (शुद्धिकरण) कहा जाता है, और उपमहाद्वीप में आम भाषा में इसे सुन्नत करना कहा जाता है। कुछ वहशी देशों (जंगलीपन सभ्यता वाले देशों) में ख़तना के नाम पर जननांगों की पूरी चमड़ी को छील दिया जाता है, जो पूरी तरह इस्लामी शरीअत के खिलाफ और ख़तना कराने वाले को कष्ट देना है,जबकि इस्लामी क़ानून के अनुसार केवल जननांगों के ऊपरी हिस्से के आसपास की अतिरिक्त त्वचा को काटना है।

ख़तना का इतिहास:  

हालांकि ख़तना का इतिहास प्राचीन मिस्र की सभ्यताओं से बताया गया है , जहां १३६० ई.पू. की  खॉन्स्पेखॉर्ड की आंतरिक उत्तरी दीवार के नक्काशी को  उकेरा गया तो  ख़तने का दृश्य मिला, कहा जाता है कि सेमिटिक/semitic (सामी) लोगों में जिनका सम्बन्ध एक आदिवासी समुदाय से था ख़तना आमतौर पर प्रचलित था, हालांकि यह सर्वव्यापी नहीं था। लेकिन इस्लामिक मान्यताओं के ठोस आधार पर इब्राहीम अलैहिस्सलाम के ख़तने का ज़िक्र मिलता है, रिवायतों में वर्णित है कि इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अस्सी (80) वर्ष की आयु में जब उनकी आयु काफी अधिक हो चुकी थी अपना ख़तना किया था, अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: "इब्राहीम(अलैहिस्सलाम) ने अपना ख़तना अस्सी वर्ष की आयु में किया था,तथा उन्होंने यह ख़तना बसूला या कुल्हाड़ी से किया था।"(सहीह बुख़ारी/६२९८,सहीह मुस्लिम/ २३७०), हाफ़िज़ इब्ने हजर लिखते हैं:इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को ख़तना करने का आदेश दिया गया तो उन्होंने बँसूला से अपना ख़तना कर लिया, जिससे उन्हें बहुत पीड़ा हुई। फिर अल्लाह ने उन पर वह्यी की (उनसे कहा) कि "इब्राहीम ! इससे पहले कि मैं तुम्हें कोई हथियार बताऊँ तुमने जल्बाजी से काम लिया है (और अपना ख़तना कर लिया है)।", तो उन्होंने कहा:"ऐ अल्लाह! मुझे आपके आदेश के पालन में देरी करना पसंद नहीं था"। (फत्हुल बारी:६/३९०),यह भी कहा जाता है कि यह उन परीक्षाओं में से एक थी जिनसे इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) को गुज़रना पड़ा था,और उन्होंने उन्हें पूरा भी किया था, जिनका उल्लेख अल्लाह तआला ने क़ुरआन मजीद के अंदर किया है:(और-उस समय को याद करो- जब इब्राहीम को उसके पालनहार ने कुछ बातों के साथ आज़माया, तो उसने उन्हें पूरा कर दिखाया।/सूरह अल्-बक़रा/१२४)

इमाम बैहक़ी ने यह भी उल्लेख किया है कि इस्माइल (अलैहिस्सलाम) का ख़तना तेरह वर्ष की आयु में हुआ था और इसहाक़ (अलैहिस्सलाम) का ख़तना सात दिन की आयु में हुआ था।(सोनन कुबरा:१७/५१३)

इमाम इब्न अल-क़य्यिम ने उल्लेख किया है कि:इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के बाद भी पैग़म्बरों में ख़तना का अमल जारी रहा, यहाँ तक कि ईसा (अलैहिस्सलाम) का भी ख़तना हुआ था। (तोह्फतुल मौदूद/१५८)

ख़तना की प्रथा भिन्न धर्मों में:

जैसाकि डॉक्टर साहब ने कहा, इसमें कोई संदेह नहीं है कि ख़तना की अवधारणा और प्रथा इस्लाम के साथ-साथ कुछ अन्य प्राचीन धर्मों, विशेष रूप से यहूदी धर्म में भी पाई जाती है, और आगे चल कर परिस्थितियों और वैज्ञानिक एवं चिकित्सिय शोध ने इसके विभिन लाभ और आवश्यकता को मनुष्य के लिए स्पष्ट कर दिया है।

यह ज्ञात होना चाहिए कि ख़तना के चिकित्सीय लाभ के अलावा, इस्लाम और यहूदी धर्म दोनों में इसको धार्मिक दर्जा एवं महत्व भी प्राप्त है। इसके अलावा ईसाई धर्म और प्राचीन सभ्यताओं में भी इसका महत्व रहा है।यहूदी धर्म में जन्म के अधिकतम सात दिनों के भीतर ही ख़तना किया जाता है। ईसाई धर्म के आधुनिक युग में यद्यपि ख़तना की कोई धार्मिक अवधारणा या प्रथा नहीं रह गई है ,इसलिए किसी भी चर्च या धार्मिक गुरु की तरफ़ से अपने अनुयायियों को ऐसा करने के लिए पाबंद नहीं किया जाता है ,और न ही ऐसा करने वालों को जो किसी कारणवश करते हैं मना किया जाता है। यद्यपि प्राचीन काल में कुछ सभास्थलों द्वारा ख़तना को पुरुषों के लिए अनिवार्य एवं आवश्यक माना जाता था। ईसाई धर्मशास्त्र के अनुसार ख़तना किसी समय में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ करता था। यही कारण है कि आज संयुक्त राज्य अमेरिका, फिलीपींस, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका, एशिया और मध्य पूर्व जैसे ईसाई-बहुल देशों में यह व्यापक रूप से प्रचलित है, जबकि ईसाई-बहुल इलाक़ों यूरोप, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन में ईसाइयों के बीच यह बहुत कम प्रचलित है। अलबत्ता उनके यहाँ ख़तना शुद्धिकरण के साधन के रूप में नहीं, बल्कि स्वच्छता के साधन के रूप में किया जाता है। ज्ञात हो कि कुछ सूत्रों के अनुसार, वर्तमान युग में कैथलिक चर्च ने ख़तने की प्रथा को एक घातक पाप कहकर इसकी निंदा की और सन, 1442 में एक्युमेनिकल काउंसिल ऑफ बैसेल-फ्लोरेंस (Ecumenical Council of Basel-Florence) में इसके विरोध का आदेश दिया। (यह जानकारी विकिपीडिया से ली गई है।)

इस्लाम में ख़तना का महत्व :

ख़तना इस्लाम में एक ऐसा अमल है जो अल्लाह और उसके  रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की शिक्षाओं द्वारा मुसलमानों के ऊपर लागू होता है,जिसके अनेक चिकित्सीय फ़ायदे भी हैं। लेकिन एक मुसलमान होने के नाते उनके लिए अल्लाह तआला की आज्ञा एवं उसके रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का तरीक़ा और आप  का हुक्म  कर्तव्य के हिसाब से सर्वोपरि होता है,अल्लाह तआला फ़रमाता है:(ऐ लोगो जो ईमान लाए हो! अल्लाह का आज्ञापालन करो और रसूल का आज्ञापालन करो तथा अपने कर्मों को व्यर्थ न करो। /सूरह मुहम्मद/३३) एवं एक जगह फ़रमाता है :(- ऐ नबी!- आप कह दें : अल्लाह और रसूल की आज्ञा का अनुपालन करो।/सूरह आले इम्रान/३२) इस सन्दर्भ में और भी कई आयतें है।  

अतः ख़तना इस्लाम में अल्लाह और उसके  रसूल सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के हुक्म के साथ ही एक धार्मिक क्रिया एवं  इब्राहीमी सुन्नत है जिसकी व्याख्या आगे आ रही है। एवं इसके अलावा आदमी के जिस्म की शुद्धता और व्यक्तिगत स्वच्छता का एक स्रोत भी  है,जो इस्लाम की शिक्षा के अनुरूप है, हदीसमें  आता है :"पवित्रता आधा ईमान है"(सहीह मुस्लिम/२२३) एवं अल्लाह तआला फ़रमाता है :(निःसंदेह अल्लाह उनसे प्रेम करता है जो बहुत तौबा करने वाले हैं और उनसे प्रेम करता है जो बहुत पाक रहने वाले हैं।/सूरह अल्-बक़रा/२२२)

तौबा करने का मतलब है पापों से पश्चाताप करना , गलतियों पर शर्मिंदा होना, अल्लाह से माफ़ी मांगना,उन्हें छोड़ना और भविष्य में उन्हें दोबारा न करने का पक्का इरादा करना।     

ख़तना की इस्लामी व्यवस्था और उसके नियम:

इस्लामी शरीअत (क़ानून) में ख़तना एक फ़ितरती (प्राकृतिक) क्रिया मानी जाती है, जिसे सोननुल फ़ित्रत (अर्थात : मानव प्राकृतिक प्रक्रिया) कहा जाता है। अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु)से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया:"पाँच चीज़ें (मानव) प्रकृति (का हिस्सा) हैं : ख़तना करना, नाभी के नीचे के बाल मूँडना,बग़ल के बाल उखाड़ना, मूँछें छोटी करना और नाख़ून काटना।"(सहीह बुख़ारी/५८८९ , ६२९७ , सहीह मुस्लिम/२५७)  यहां फ़ितरत (प्रकृति) के अर्थ का उल्लेख करना उचित है, ताकि यह अच्छी तरह समझा जा सके कि इस्लामी शरिया में ख़तना के प्राकृतिक होने का क्या अर्थ है।:

प्रकृति का अर्थ है : सृजन, सहज, प्रवृत्ति और संरचना। इसी तरह  प्रकृति का अर्थ  है: प्राकृतिक अवस्था, धर्म, परंपरा, पद्धति, जन्म और वे गुण जो प्रत्येक प्राणी में उसकी रचना के समय विद्यमान होते हैं। इसी तरह अनेक इस्लामी विद्वानों ने फ़ितरत का अर्थ इस्लाम धर्म से लिया है, और हदीस के अधिकांश टीकाकार इस बात पर सहमत हैं कि उपरोक्त हदीस और इसी तरह की कुछ अन्य हदीसों में फ़ितरत शब्द को सुन्नत के अर्थ में प्रयोग किया गया है, इसी तरह यह फ़ितरत नबियों की सुन्नत को दर्शाता है, जिनका करना पिछली सभी शरीअतों (धर्मों) में  रहा है।

इस्लामी शरिअत में ख़तना के हुक्म को लेकर ओलमा के दरमियान मतभेद है की यह क्रिया किसी मुसलमान पर वाजिब (अनिवार्य) है या मुस्तहब (अनुशंसनीय) है, अतःअधिकाँश ओलामा ने इसे अनिवार्य माना है,जबकि कुछ मुस्तहब मानते हैं। अब्दुल्लाह इब्न अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहा करते थे कि:"जिस व्यक्ति का ख़तना नहीं हुआ है, उसका हज और नमाज़ स्वीकार्य नहीं है।" (अल-मुगनी:१/११५)

ख़तना के चिकित्सीय लाभ एवं मानव स्वास्थ पर ऊसके प्रभाव:

जैसाकि ऊपर बताया गया कि डॉ.अजय कुमार ने ख़तना के स्वास्थ्य और चिकित्सीय लाभ तथा इसे न करवाने के नुक़सान के बारे में बात की,अतःनिम्न में हम इन फायदों एवं इसके अन्य लाभों का संक्षेप में उल्लेख करना उचित समझते हैं।:

(१) - ख़तना स्वच्छता और पवित्रता को सुगम बनाने का एक बेहतरीन साधन है।

(2) - ख़तना की सूरत में जननांगों की तहारत(शुद्धि) एवं सफ़ाई आसान हो जाती है, जिससे संक्रमण से बचाव होता है।

(3) - ख़तना की सूरत में पेशाब की नली में संक्रमण का ख़तरा कम हो जाता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि ख़तना न कराने वाले बच्चों में मूत्र के सिस्टम और मूत्र मार्ग में संक्रमण बहुत आम है, और छोटी उम्र में बच्चों  में गंभीर संक्रमण से कई जटिलताएं हो सकती हैं, जिनमें गुर्दे की समस्याएं भी शामिल हैं, और यदि संक्रमण बिगड़ जाता है तो मूत्राशय के अंदर संक्रमण का ख़तरा होता है, जिससे मूत्र संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं।

(४) - ख़तना जननांग के सामान्य रोगों को रोकने का एक साधन है, जिनमें त्वचा से किसी भी हानिकारक तरल पदार्थ का निकलना, साथ ही उसमें कठोरता और तनाव आना शामिल है।

(५) - ख़तना एक बड़ी बीमारी लिंग कैंसर (Penile cancer) से बचाव है। अमेरिकन  कैंसर सोसाइटी (American Cancer Society/2009) ने अपने अध्ययन में इस बात को अस्पष्ट  रूप से कहा है कि: अधिकांश विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि शिश्न (लिंग) के कैंसर से बचाव के एकमात्र उपाय के रूप में ख़तना का सुझाव दिया जाना चाहिए अमेरिकन एकेडमी ऑफ पिडीयाट्रिक्स(American Academy of Pediatrics/1999) के अनुसार अध्ययनों से यह पता चला है कि नवजात शिशुओं का ख़तना शिश्न के कैंसर से थोड़ी सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन एक बड़ी आयु में किया गया ख़तना भी सुरक्षा का वही स्तर प्रदान करता हुआ प्रतीत होता है। इसके अतिरिक्त, चूंकि शिश्न का कैंसर एक दुर्लभ बीमारी है, अतः ख़तना न किये हुए किसी पुरुष में शिश्न का कैंसर होने की संभावना हालांकि ख़तना किये हुए पुरुष से अधिक होने पर भी निम्न बनी रहती है। एवं ज्ञात हो कि अनुसंधानकर्ताओं ने बताया है कि जिन व्यक्तियों का ख़तना जन्म के समय ही हो चुका हो, उनकी तुलना में उन व्यक्तियों में शिश्न का कैंसर होने का जोखिम अधिक होता है, जिनका ख़तना कभी न हुआ हो।(विकिपीडिया)   

(6) - ख़तना लिंग में रक्त के थक्के जमने की समस्या को रोकता है।

(७) - ख़तना यौन संचारित संक्रमणों से सुरक्षा है,क्योंकि ख़तना न कराने के कारण जननांगों के आसपास की अतिरिक्त त्वचा बैक्टीरिया (Bacteria) और विभिन्न सूक्ष्मजीवों एवं रोगाणुओं (Microorganism / Germs) के प्रजनन एवं उनके विकसित होने का कारण बनती है, जो यौन संभोग(Sexual intercourse) के दौरान पार्टनर के प्रेषित होने का जोखिम भरा होता है,क्योंकि अध्ययनों से पता चला है कि यौन संचारित रोग ख़तना न कराने वाले पुरुषों से काफी हद तक फैलते हैं।

(८) - चूंकि लिंग के ऊपरी भाग के चारों ओर अतिरिक्त त्वचा की उपस्थिति इसकी स्वच्छता और सफाई के क्रम में बाधक होता है, तथा इसके कारण इसकी कोशिकाओं (cells) एवं त्वचा के अंदर बैक्टीरिया या अन्य कीटाणु और तरल पदार्थ जमा हो जाते हैं, इसलिए इसमें गंध आदि होना स्पष्ट है अतः ख़तना के कारण इसके समाप्त होने की अधिक संभावना है।

(९) - ख़तना न होने की सूरत में साफ-सफाई के अभाव में जननांगों में पनपने वाले कीटाणुओं और जीवाणुओं के कारण संभोग के बाद साथी के गर्भाशय में कैंसर या अन्य हानिकारक रोग पनपने की संभावना रहती है। इसलिए ख़तना भविष्य में ऐसी किसी भी बीमारी से बचाव का एक साधन है। इसी प्रकार ख़तना कराना न केवल पुरुष के लिए विभिन्न रोगों से बचाव का एक साधन है, बल्कि उसके साथ यौन संबंध बनाने वाली साथी के लिए भी सुरक्षा का साधन एवं विभिन्न रोग निवारक है।

(१०) - जैसाकि बताया गया ख़तना विभिन्न यौन संचारित रोगों जैसे:हर्पीज़ (Herpes), सिफलिस (Syphilis), फंगस/कैंडिडा (Fungus/Candida), गोनोरिया (Gonorrhea), मस्सा (warts) और अल्सर (Chancroid) इत्यादि को रोकने के लिए एक उत्कृष्ट और सुरक्षात्मक उपाय है।

(११) - नए शोध से यह भी पता चला है कि ख़तना किये गये पुरुषों में एचआईवी/एड्स  (HIV/AIDS) जैसी घातक बीमारी के होने की संभावना ख़तना न किये गये पुरुषों की तुलना में कम होती है। इसका मतलब यह नहीं है कि ख़तना कराने वाला व्यक्ति एड्स के ख़तरों से पूरी तरह सुरक्षित होता है, क्योंकि व्यभिचार और इस रोग से संक्रमित व्यक्ति के साथ यौन संबंध एड्स फैलने के मुख्य कारणों में से है ,जिस से ख़तना किए हुए और ख़तना  न किए हुए दोनों तरह के लोग समान रूप से प्रभावित हो सकते हैं।

यहाँ व्यभिचार और समलैंगिकता के संबंध में इस्लामी शरिया की सख्त व्यवस्था और क़ानून के महत्व और उसकी आवश्यकता का पता चलता है।

(१२) - ख़तना करना मनुष्य के लिए एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसे न करना प्रकृति के विरुद्ध है।

(१३) - अगर इस्लामी दृष्टिकोण से देखें तो एक मोमिन के लिए ख़तना का सबसे बड़ा लाभ अल्लाह की प्रसन्नता और उसकी स्वीकृति प्राप्त करना है,क्योंकि ऐसे मामले को जिसका हुक्म अल्लाह ने दिया है अंजाम देकर बंदा अल्लाह सर्वशक्तिमान की आज्ञा का पालन करता है और अल्लाह के पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत का पालन करता है।

एक आपत्ति और उसका जवाब:

कुछ लोग यह आपत्ति जताते हैं कि यदि ख़तना अनिवार्य ही था तो अल्लाह ने मनुष्य को ख़तना के साथ ही क्यों नहीं पैदा किया ?      

ऐसी आपत्तियाँ या तो कुछ कट्टरपंथी व्यक्तित्व एवं घृणित मानसिकता वाले तत्वों द्वारा इस्लाम के विरोध में उठाई जाती हैं या अल्लाह के आदेशों और निर्देशों के महत्व एवं उनकी ज़रूरत से अज्ञानता पर आधारित होती हैं। एक मुसलमान का मानना ​​है कि अल्लाह जो भी आदेश देता है वह बिना कारण के नहीं होता,इसमें कुछ न कुछ कारण अवश्य होगा,चाहे हमें इसकी हिकमत एवं आशय समझ में आ सके या नहीं। इसलिए यदि अल्लाह तआला के किसी आदेश पर अमल छोड़ने के लिए कोई मुनासिब एवं धार्मिक वजह न हो तो एक मुसलमान चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों बिना किसी अड़चन के एवं पुरे मन के साथ उस पर अमल  करता है।और यह अमल उस पर अनिवार्य है। और फिर परिस्थितियों और आवश्यकता के अनुसार एवं ज़रूरत के आधार पर इसके गुण,दोष एवं ज़रूरत के अनुसार उस पर चर्चा एवं समाधान इस कला के विशेषज्ञ (ओलामा/ इस्लामी शरीअत के विद्वान) करते हैं। ख़तना भी उन्हीं आदेशों तथा ज़रूरतों में से एक है, हालांकि इसके लाभ, महत्व और आवश्यकता को प्राचीन काल से ही जाना , समझा एवं समझाया जाता रहा है, खासकर जब से वर्तमान चिकित्सा अनुसंधान ने इसे दृढ़ता से स्पष्ट कर दिया है, और डॉक्टरों एवं विशेषज्ञों ने स्पष्ट रूप से यह बताया है कि बच्चे के जन्म के बाद जो त्वचा हटाई जाती है वह भ्रूण की स्थिति के लिए जब वह मां के गर्भ में होता है बहुत महत्वपूर्ण होती है ,क्योंकि लिंग शरीर का एक बहुत ही संवेदनशील अंग है, खासकर इसका ऊपरी हिस्सा, और चूंकि बच्चा मां के गर्भ में हरकत करता रहता है,और उसके अंदर तंत्रिका अथवा नसों का तनाव भी होता है, (हालाँकि उसका तंत्रिका सिस्टम तंत्र अभी गठन और निर्माण के चरण से गुजर रहा होता है), और अपूर्ण प्रणाली पर यह तनाव उसके विकास में बाधा डालता है और अपरिपक्वता का कारण भी बनता है ,इसलिए इस अंग के निर्माण और तंत्रिका तंत्र को नियंत्रित करने के लिए इस त्वचा की उपस्थिति बहुत महत्वपूर्ण एवं आवश्यक होती है, जो इसके लिए रक्षक (Protector) के रूप में कार्य करती है। अन्यथा नुकसान की प्रबल संभावना है। फिर जब वही बच्चा पैदा हो जाता है तो इस अतिरिक्त त्वचा की कोई ज़रूरत बाक़ी नहीं रहती एवं उसे ऐसे ही छोड़ देने से अनगिनत नुकसान हो सकते हैं। इसलिए माँ के गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए इस अतिरिक्त त्वचा का होना बेहद ज़रूरी,और उसकी सुरक्षा व संरक्षण का एक अहम कारण भी है एवं जन्म के बाद इसे हटा देना ही मुनासिब है, बल्कि कुछ हालात में इसे हटाना अनिवार्य हो जाता है।

महिलाओं का ख़तना :

महिलाओं का ख़तना जिसे FGM / Female Genital Mutilation (महिला जननांग कर्तन) कहा जाता है जो महिला के जननांग के बाहरी भाग के ऊपरी हिस्से को काट देने की प्रथा है, यह प्राचीन काल से दुनिया के विभिन्न हिस्सों में प्रचलित रहा है।  

यह ध्यान देने योग्य बात है कि विभिन्न जातीय समूहों में महिला ख़तना के विभिन्न तरीके प्रचलित रहे हैं , लेकिन सामान्य विधि के अनुसार, महिला जननांग में एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण यौन अंग के ऊपरी हिस्से को जिसे अंग्रेजी में क्लिटोरिस clitoris कहा जाता है, काट दिया जाता है,जिसमें लघु भगोष्ठ और आंतरिक भगोष्ठ आंशिक रूप से या पूरी तरह से काटकर अलग कर दिए जाते हैं।

यूँ तो महिला ख़तना एक  प्रथा एवं आदेश के संदर्भ में इतना महत्वपूर्ण और आम नहीं है, बल्कि यह उपमहाद्वीप और आसपास के क्षेत्रों में विलुप्त है,(हालांकि यदा कदा यहां-वहां देखने और सूनने को मिल जाता है) यद्यपि यह प्रथा अभी भी विश्व के गर्म क्षेत्रों में मौजूद है,विशेष रूप से अफ्रीकी देशों जैसे सोमालिया (Somalia), गिनी,(Guinea),मिस्र (Egypt), इरीट्रिया (Eritrea), माली (Mali), सिएरा लियोने (Sierra Leone), सूडान(Sudan), गाम्बिया (Gambia), बुर्किना फासो (Burkina Faso), एबिसिनिया/इथियोपिया (Abyssinia/ Ethiopia), मोरितानिआ (Mauritania), लाइबेरिया(Liberia)और गिनी-बिसाऊ (Guinea-Bissau) में यह अब भी आम है। और अफ्रीका के बाहर यह प्रथा यमन, इराक के कुर्द क्षेत्रों और दक्षिण अमेरिका की कुछ जनजातियों में भी कुछ हद तक मौजूद है। इसी तरह भारत में बोहरा समुदाय में भी यह प्रथा पाई जाती है। लेकिन अब इसे एक क्रूर परंपरा कहते हुए कुछ बोहरा महिलाओं ने इस पर रोक लगाने की मांग की है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट में भी एक याचिका दायर की गई जिसमें कहा गया है कि दाउदी वोहरा समुदाय में ख़तना हर बच्चियों के साथ किया जाता है और वह भी बिना चिकित्सकीय कारणों के और न ही कुरान में इसका जिक्र है, इसलिए इस पर पूर्णरूप से रोक लगाईं जाए ।  

एक अनुमान के अनुसार (2013 के आंकड़ों पर आधारित) दुनिया भर में इस प्रथा से गुज़रने वाली महिलाओं की संख्या लगभग सत्तर करोड़ थी। संयुक्त राष्ट्र के २०२४ की एक रिपोर्ट के अनुसार 23 करोड़ महिलाएं और बच्चियां ख़तना का शिकार हुई हैं। 2016 की तुलना में देखें तो इनकी संख्या में तीन करोड़ यानी 15 फीसदी का इजाफा हुआ है ।कुछ ऐसे देश हैं जहां विभिन्न संगठन (संयुक्त राष्ट्र महासभा सहित) इस प्रक्रिया को रोकने के प्रयासों में लगे हुए हैं, जिसके कारण इसमें उल्लेखनीय कमी आई है।

महिला ख़तना और इसके पक्ष-विपक्ष पर बहस एक लंबी चर्चा का विषय  है, लेकिन तथ्य यह है कि यह प्रथा प्राचीन काल से ही दुनिया के लगभग आधे हिस्से में प्रचलित रही है। (कुछ जानकारी विकिपीडिया से ली गई है)।  

कुछ देशों में महिला ख़तना से होने वाले कुछ नुकसान को बड़े ही नकारात्मक सोंच एवं उत्साह के साथ उठाया जाता है। और कुछ जगहों पर कुछेक गिने चुने लोगों के ज़रिये मुसलमानों को इसका ज़िम्मेदार मान कर इस्लाम पर आपत्ति जताई जाती है। हालाँकि उन्हें यह पता होना चाहिए कि इस्लाम में इसे अनिवार्य कार्य नहीं माना जाता है, बल्कि आवश्यकता और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इसे अनुशंसित कार्य माना जाता है।(हालांकि कुछ फ़ोक़हा/न्यायविद इसकी अनिवार्यता की तरफ़ गए हैं।)और दूसरी बात कि यह प्रथा इस्लाम के आगमन से पहले सदियों से दुनिया के अधिकांश हिस्सों में प्रचलित थी, और इस्लाम ने इसे प्रतिबंधित नहीं किया, बल्कि इसे एक गैर-अनिवार्य प्रथा के रूप में बाक़ी रखा। यही कारण है कि ज़्यादह तर मुसलमान इस पर अमल भी नहीं करते, लेकिन अगर कहीं इसकी जरूरत महसूस होती है और इसका क्रियान्वयन अपरिहार्य एवं आवश्यक होता है तो इसे अमल में लाया जाता है। अब यह डॉक्टरों एवं शोधकर्ताओं पर निर्भर है कि वे दुनिया को ईमानदारी से समझाएँ कि किन परिस्थितियों में यह काम जोखिम भरा होता है या इस से किसी तरह का नुकसान पहुँचने की संभावना है। सिर्फ़ इसलिए कि किसी धर्म में इस पर अमल जाएज़्(वैध)है वावेला करना एवं अनर्गल बातें करना अनैतिक एवं मानसिक विकलांगता का पूर्ण  संकेत बल्कि प्रमाण है।

अल्लाह तआला हमें हर तरह के अच्छे काम करने की शक्ति दे और हर तरह के नुक़सान और बुराई से हमारी सुरक्षा करे।

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अब्दुल अलीम सलफ़ी (सऊदी अरब)

निवासी : बीजबनी ,घोड़ासहन ,पूर्वी चम्पारण बिहार

(10/11/2025)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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